मैंने ध्यान करना क्यों शुरू किया ?

एक दिन मे सुबह के समय भागे जा रहा था ओर सोच रहा था की इतना तेज भागूँगा की सबसे आगे निकल जाऊंगा लेकिन अगले ही पल मन मे यह खयाल आता है की आखिर भागकर जाना कहा है ?

ओर ये सबसे बड़ी बात ये मन मे विचार कहा से आ  रहे है | शायद मै ओर मेरा शरीर दो अलग अलग चीजे है मै हर समय विरोधाभाष क्यों महुसूस करता हु | एक  मुझे डराने की कोशिश करता है ओर एक मुझे सपोर्ट भी करता है |

कुछ सवालों की सूची मै यंहा बताने की कोशिश करता हु |

1. ये दुनिया किस दिशा मे जा रही है आखिर ये  दुनिया बनी हुई है तो  उसका क्या उद्देश्य है ? अगर किसी दिशा मे जाना है तो सब लोग मिलकर उस दिशा मे काम क्यों  नहीं करते है ?ओर हा अगर कही जाना है तो कहा ओर क्यों जाना है ?

2. ये जीवन मरण का चक्र क्यों बना हुआ है आखिर मरने के बाद क्या होता है ओर हा आखिर आदमी मारता ही क्यों है कैसे मार जाता है मरते समय आदमी क्या सोचता होगा ?

ओर भी बहुत सारे सवालों का जवाब खोजने की कोशिश करते हुए मैंने ध्यान करना शुरू किया ओर मुझे लगता है की इन सभी सवालों का जवाब भी हमारे अंदर ही है ओर प्रत्येक सवालों का जवाब हर एक आदमी के लिए अलग अलग होगा ओर बिना मेहनत ओर ध्यान किए इन सभी सवालों का जवाब कोई नहीं जान सकता है |

ओर यही से अध्यात्म ओर दर्शनशास्त्र की शुरुवात होती है |

ओर हा अगर मैंने कुछ चीजों का उत्तर जान लिया तो निश्चय ही बताने की कोशिश करूंगा मुझे लगता है | मैंने बहुत सारे उत्तर खोज लिए है ओर बहुत सारे खोजने बाकी है |

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